गुणसूत्र की परिभाषा –
👉 गुणसूत्र का नामकरण डब्ल्यू वाल्डेयर ने किया सन् 1888 में गुणसूत्र का नामकरण किया था
👉गुणसूत्रों में पाए जाने वाले अनुवांशिक पदार्थ को जीनोम कहते हैं जीन इन्हें गुणसूत्रों पर पाया जाता है
👉गुणसूत्रों के बाहर जिन यदि कोशिका द्रव के कोशिकायंगों में होती है तो उसे प्लाज्मा जीन करते हैं
👉1956 ईस्वी में एस. बेंजर द्वारा जीन की आधुनिक विचारधारा दी थी इसके अनुसार जीन के कार्य की इकाई सिस्ट्राॅन उत्परिवर्तन की इकाई म्यूटाॅन तथा पुनः संयोजन की इकाई रेकाॅन कहा गया।
👉 मानव में 20 आवश्यक अमीनो एसिड पाए जाते है।
👉 आर्थर कर्नवर्ग ने 1962 ईस्वी में डी एन ए पॉलीमरेज नामक एंजाइम की खोज की , जिसकी सहायता से डीएनए का संश्लेषण होता है
पैरामीशियम ऑरेलिया – 30 से 40
मनुष्य – 46 (23 जोडें)
प्याज – 16
गोभी – 18
कपास – 52
मटर – 14
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गुणसूत्रों का आकार एवं आकृति –
गुणसूत्र अपने संपूर्ण लंबाई में एक समान मोटाई के होते हैं। सभी गुणसूत्रों में एक संकीर्णन होता है। इसको ही प्राथमिक संकलन कहा जाता है। प्राथमिक संकीर्ण में भी स्थित सेंट्रोमियर होता है।
किसी-किसी गुणसूत्र में दूसरे सिरे पर गुंडी नुमा या गांठ के रूप में उभर भी पाया जाता है। इस प्रकार की रचनाओं को सेटेलाइट अथवा ट्रैवेंट भी कह सकते हैं।
‘गुणसूत्रों की परिभाषा’ की संरचना –
संयुक्त सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखने पर किसी गुणसूत्र में अनेक भाग दिखाई देते हैं।
पेलिकल –
पेलिकल गुणसूत्रों के चारों ओर क्रोमेटिन पदार्थ के द्वारा बनी एक पतली सी झिल्ली के रूप पाया जाता है।
मैट्रिक्स – मैट्रिक्स ही गुणसूत्र का आधारी पदार्थ होता है। इसमें दो धागे नुमा क्रोमोनिमेटा पाया जाता है।
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